सोमवार, 16 अक्टूबर 2023

गोंडसमाज का सागर के बढतें कदम












      सागर गोंडसमाज समाज महासभा  के बढतें कदम ,

सागर संभागीय कमेटी के संभागीय अध्यक्ष ने  आपनी टीम का गठन करते हुये ,मनोज सोयाम बमोरी  को संभागीय टीम का कोषअध्यक्ष नियुक्ति किया , वही शैणिक प्रकोष्ठ से संभागीय अध्यक्ष वीरेन्द सिह,को बनाया और इस अवसर पर समाज के सभी  लोगों की उपस्थिति मैं बडे ही हर्ष के साथ बधाई  दी  नियुक्ति होने वाले नयें पद अधिकारियो

 


 सागर गोंडसमाज समाज 
    



गुरुवार, 28 सितंबर 2023

बड़ादेव ठाना सभा मंच का हुआ भूमि पूजन ग्राम सिंद्रादेही, उगली, तहसील केवलारी जिला सिवनी

 बड़ादेव ठाना सभा मंच का हुआ भूमि पूजन

ग्राम सिंद्रादेही, उगली, तहसील केवलारी जिला सिवनी


केवलारी विधायक श्री राकेश पाल जी द्वारा विधायक निधि से 1.50 एक लाख पच्चास हज़ार रुपये स्वीकृत किया गया जिसका भूमि पूजन दिनांक 28 सितम्बर 2023 को संपन्न हुआ। 


गोंड समाज महासभा ग्राम कमेटी सिंद्रादेही

बुधवार, 27 सितंबर 2023

24/09/2023 गोंडसमाज महासभा जिला कमेटी मण्डला

 

आज दिनांकः 24-09-2023 दिन रविवार को गोंड समाज महा सभा जिला कमेटी मण्डला की बैठक आदिवासी धर्मशाला महाराजपुर में दोपहर 12 बजे से आयोजित किया गया जिसमें उपस्थित समस्त सगा पाड़ी गणों के द्वारा सर्व सम्मति से निम्नांकित संकल्प पारित किया गया-

1.जिले में स्थित आवासीआदिवासी छात्रावासों का भ्रमण कर शैक्षणिक गुणवत्ता की पहचान करना और वहां के बच्चों के समक्ष आने वाली समस्याओं की जानकारी प्राप्त कर उन समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करना पहली प्राथमिकता है। जिसके लिए जिला स्तर पर सहायक आयुक्त को सूचना दिया जाकर छत्रावासों भ्रमण किया जाना है। जिसमें भ्रमण के लिए गठित दल में पुरुष एवं महिला सदस्य सम्मिलित रहेंगे।

2-गोंडी भाषा.

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1.गोंडी भाषा के अंक 1से 10तक अंकों का ज्ञान स्वयं करना और घर के सदस्यों को भी कराना है।

2-परिवार के सदस्यों के साथ प्रतिदिन दो शब्द सीखें व बोलें।

3-बोलचाल की भाषा में आपस में प्रतिदिन गोंडी से बोलें व बात चीत करें।

4-गोंडी भाषा में अपना नाम बतायें और प्रतिदिन सीखने सिखने व सिखाने का प्रयास करना है।

5- गोंडी लिपि में 1से 10 तक गिनती का ज्ञान करना व करवाना।

6-गोंडी लिपि में अ से अ: तक स्वर का ज्ञान करना व करवाना।

गोंडी धर्म:-

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1-बड़ा देव (फड़ा पेन)गोन्गो के अलावा दूसरे देवी देवताओं की पूजा पाठ न हो।इसका विशेष रूप से ध्यान रखना।

2-सल्ले गंगारा की प्रतिक चिन्ह प्रत्येक घर में हो।

3-अगरबत्ती का उपयोग न हो।

4-सरई रार,गुड़,तेल से धूप लगाया जावे और कोया पुंगार (महुआ फूल) चढ़ाया जावे।

5-टुण्डा नेंग(जन्म संस्कार)में-छटी चौंक में चंगेरा डलिया प्रथा बन्ध हो इस पर कड़ाई से  पालन हो।

एवं कपड़े का व्यवहार पूणत: बन्द हो। बच्चों को नगद राशि ही दिया जावे।

मन्ढा नेंग (विवाह संस्कार) में दहेज की व्यवस्था पूणत: बन्द हो,दानदाताओं का नाम लिखने प्रथा बन्द हो ।

कुन्डा नेंग(मृत्यु संस्कार) में- अनावश्यक कपड़े देने की  व्यवस्था पूणत:बन्द हो और घाट में  भी कपड़े का  व्यव्हार  न हो।

इस बैठक में इन  सगा पाड़ी गणों  उपस्थिति रही।

तिo एस आर गोंड  प्रदेश सचिव,

तिo डी एल उर्फ धर्मेश उइके जिलाअध्यक्ष,युवा प्रकोष्ट जिला  अध्यक्ष ति o शिशु शिन्दू भलावी,ति जय सिंह पन्द्रे जी जिला शैक्षणिक 

 आर्थिक  प्रकोष्ट अध्यक्ष,नारायणगंज ब्लॉक कमेटी  अध्यक्ष ति- धन्नू लाल  मरावी। नैनपुर ब्लॉक कमेटी अध्यक्ष ति  श्रीकुमार मरावि,बिछिया ब्लॉक कमेटी युवा प्रकोष्ट अध्यक्ष,ति•कमलेश तिलगाम नगर अध्यक्ष,एवं और भी सम्मानीय सगा पाड़ी गणों की  उपस्थिति रही। 

जिसकी एक झलक की तस्वीर

शनिवार, 23 सितंबर 2023

बडतूमा बडादेव पेनठाना मै धूम धाम से वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है पेनठाना बड़ा देव स्थापना दिवस

 23,24,25, तारिख को सागर के  बडतूमा बडादेव पेनठाना मै बडें धूम धाम से वार्षिक उत्सव मनाया गया 

जिसमे सागर जिले की सभी तहसील के सागाजनो  पेनठाना मैं कोयापुनेम सुनने पधारे 



सागर गोंडसमाज महासभा के जिला अध्यक्ष तिरु प्रहलाद  ऊईके, और सचिव राजेश सोयाम, सभांग अध्यक्ष, टेकाम बाबा जी, नगर अध्यक्ष जाहर उल्लाडी,  भरत बट्टी, ब्लाक अध्यक्ष बण्डा, कमलेश मरकाम, और सागर के गोड सभा के सभी पद अधिकारी के छाया चित्र 

सागर में बड़ा देव पेनठाना 2015 में स्थापना हुई जब से लगातार निरंतर सागर में गोड समाज महासभा द्वारा  आदिवासी समाज द्वारा बड़े धूमधाम से बड़ा देव पेन ठाना स्थापना मनाया जा रहा है,

गुरुवार, 11 मई 2023

गोंडसमाज सागर की ब्लाक कमेटी रेझा ने कोयापुनेम और माडमिंग (विवाह )सम्पन्न

 सागर जिला के अन्तर्गत रहली तहसील  के  रेझा गांव मै 

दिनांक 05/05/2023 को गोंडसमाज  महासभा  सागर की ब्लांक कमेटी के के द्वारा नौ दिवसीय कोया पुनेम संपन्न हुआ जिसमें अंतिम दिन में वैशाखी पूर्णिमा के अवसर होने के चलते जवारे विसर्जन के साथ- साथ भक्तों द्वारा बड़े उत्साह के साथ ज्वाला माई पेनठाना  मैं रेझा मै ज्वाला माई की असीम कृपा से गोंड समाज महासभा की  रेझा कमेटी  राजा द्वारा

आस्था और विश्वास ज्वाला माई पेनठाना पर देखने को मिला 

जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पधारे जिसमें क्या बूढ़े क्या बच्चे क्या महिला क्या पुरुष सभी लोगों ने सुबह से ही यहां आना शुरू कर दिया जो 

पहली बार पेनठाना  रेझा ज्वाला माई  पर आयोजित कोया पुनेम को सुनने के लिए 9 दिवसीय कार्यक्रम में भारी संख्या में लोगों की उपस्थिति रही वहीं अंतिम दिन में जवारे विसर्जन के साथ-साथ विवाह माडमिंग आकर्षक 

गोंड समाज महासभा ब्लॉक कमेटी रेझा  के तत्वधान में आयोजित कोयापुनेम  9  दिवसीय कार्यक्रम के लिए

सिवनी जिले से आए धर्माचार्य और सागर ब्लाक नगर शहर कमेटी के लोगों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अपना हर संभव प्रयास किया

इन्होंने संपूर्ण मानव समाज को प्राकृतिक  उत्पत्ति के साथ-साथ  और  आदिवासी जो प्राचीन समय से निवास कर रहे हैं उन लोगों की प्राकृत्ति के रक्षा और सुरक्षा के बारे में बड़े विस्तार पूर्वक बताया

इसमे

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

सागर के बढादेव पेनठाना पर मनाया जा रहा है बड़े धूमधाम से वार्षिक स्थापना उत्सव

 23 सितंबर 2022 शुक्रवार से 25 सितंबर तक आयोजित होगा कार्यक्र

स्थान बडतुमा नगर पालिका मकरोनिया जिला सागर

तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजन समिति समस्त गोंड समाज महासभा आदिवासी  समुदाय ने किया आयोजन

मुख्य रुप से सागर जिला की गोंड समाज महासभा, इस कार्यक्रम का आयोजन 2015 से करती आ रही है इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है हमारी प्राकृतिक संस्कृति गोंडी  रीति रिवाज आदिवासी समुदाय के भुमका, द्वारा धर्म संस्कृति के बारे में तीन दिवसीय कोया पुनेम चल रहा है।गोंडसमाज महासभा और अखिल गोंडसमाज के पद अधिकारी सामिल हुई और 

आदिवासी समाज के बहुत बढी संख्या मे जनसमुदाय शामिल हुआ जगा राजेन्द्र मसकोले धर्मचार जी प्राकृतिक उपदेश दिये और 


बुधवार, 7 सितंबर 2022

बचपन का प्यार

 आमतौर पर कभी ना कभी कोई ना कोई किसी ना किसी से कर ही लेता है हम देखते हैं सुनते हैं पुरानी बातें पुराने लोग कभी कुछ अट्रैक्शन हुआ  भी कुछ ऐसा हुआ जिसको लगता है कि यार बस यही प्यार है पहले सरकारी स्कूलों में खाकी पेंट और लाल

आज के समय में काम कुछ नहीं है सब व्यस्त हैं

 क्रांति के युग में जब से आदमियों के पास मोबाइल आए हैं मानो ऐसा लगता है कि देश विदेशो दूसरा राज्य, दूसरा जिला हो दूसरा गांव दूसरी गली हो या दूसरा मोहल्ला हो कुछ भी हो हम एक दूसरे को हर पल हर समय देखते रहते हैं उनके विचारों को देखते रहते हैं उन्हें आज क्या किया आज कहां फोटो डाली आज क्या कर रहे हैं हमें तत्काल पता चल जाता है ऐसा तो पहले कहा जाता है कि प्राचीन समय में जिन्हें कहा जाता है देव के समय में भगवानों के समय में भी नहीं था आज का आदमी इतना क्रांतिकारी हो गया है कि वह एक स्थान पर होकर भी कईयों को बात करके स्थान अलग-अलग बताता है झूठ बोलने का एक अच्छा तरीका है यदि वह गांव में है तो बोलेगा कि मैं शहर में और शहर में तो बोलेगा कि मैं गांव में हूं ऐसे ऐसे ही कारनामे कर रहे हैं कि लगता है कि वास्तव में उनसे बड़ा व्यस्त और उनसे जानकार तो कोई है ही नहीं बहुत से लोगों को मैंने देखा है आपस में बात करते हैं कि यदि मैं उसको सही बता दूंगा तो अभी आकर मुझे पका देगा पकाने का अर्थ हम बताना चाहते हैं आपके पीछे पड़ना होता है

गुरुवार, 11 अगस्त 2022

बहुत बड़ा त्यौहार है। आदिवासियों का विश्व आदिवासी दिवस।

पूरी दुनिया में विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त के दिन मनाया जाता है जो इस वर्ष भी बड़े धूमधाम से मनाया गया हम बात कर रहे हैं। खासकर भारत देश की और विदेशों की भी कुछ तस्वीरें आपको दिखाई जाएंगी वहीं मध्यप्रदेश में विशेष संदर्भ



   विश्व आदिवासी दिवस अपना परम्परा से बनाते हुये 
आदिवासी समुदाय की महिलाये ।


भारत देश में 9 अगस्त के दिन मनाया गया विश्व आदिवासी दिवस हम आपको बताने विश्व आदिवासी दिवस संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1993 में घोषित किया था। इस वर्ष को 9 अगस्त से आदिवासी विश्व आदिवासी संपूर्ण दुनिया में आदिवासी लोग मना रहे हैं।


 गैर आदिवासी समुदाय की परंपरागत प्रकृति से जुड़े लोग भी इस दिवस को मनाते हैं ।


आखिर क्या था जो इनको विश्व आदिवासी दिवस के रूप में घोषणा करनी पड़ी वैसे भी हम जानते हैं। आदिवासी जो प्रकृति से प्रकृति के वाशिंदे हैं प्राकृती पुत्र हैं बहुत सी ऐसी खोजबीन बहुत से ऐसे तक तथ्य सामने है  आदिवासी प्रकृति का बहुत अच्छे से रक्षण कर सकते हैं ऐसी ऐसी  जगह दुनिया में है जहां जीवन संभव नहीं लेकिन कई ऐसे आदिवासी समुदाय हैं जो वहां पर आज भी जी रहे हैं और उन टापू पर आज के आधुनिक जैसे कि मोबाइल इंटरनेट खान पीन की कई ऐसी चीजें संसाधन यातायात के संसाधन उपलब्ध ना होने के कारण भी यह आदिवासी लोग आज भी अपने परंपरागत वेशभूषा में जंगल में निवास कर रहे हैं और इसी सबको और इन्हीं सब को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक कमेटी गठित की 1987 से अपना काम कर रही थी इसके पहले से भी कर रही थी लेकिन 1987 में खास कमेटी बनी जो 5 साल में उसने अपनी रिपोर्ट दी और फिर जाकर 1993   1994 को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई आदिवासियों के प्रकृति के लगाओ और प्रकृति के उनकी सही रखने के तौर तरीके और देश में भारत देश हो या विदेशों और भी दुनिया जगत हो देखते हुए उनके बलिदानों को देखते हुए उनके समर्पण को देखते हुए प्रति उनके लगाव को देखते हुए संसार  में उनके प्रेम को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासी दिवस के रूप में घोषणा की जिसे पूरी दुनिया में विश्व आदिवासी का नाम दिया गया मेरे  हिसाब से दुनिया का एक ऐसा । जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने एकमात्र दिवस है जिसे घोषणा की है आदिवासियों के लिए निश्चित ही बहुत काबिले तारीफ है। 
 दुनिया में करीब 37 करोड़ आदिवासी लोग निवास करते हैं वही भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 10 करोड़ आदिवासी और 705 जनजाति समुदाय निवास करते हैं निश्चित ही यह आंकड़े किसी समुदाय के किसी खास समुदाय के बहुत ज्यादा हैं।
मध्यप्रदेश में विश्व आदिवासी दिवस

 आदिवासियों के विश्व आदिवासी दिवस 

      ये छिन्दवाडा के गोड समुदाय के लोगों द्वारा आदिवासी दिवस 

़ ये सिवनी जिला के गोंड समुदाय के लोग आदिवासी दिवस मनाते हुये 

   आपनी परम्परा के अनुसार वेशभूषा धारण किया युवक आदिवासी
समुदाय छिन्दवाडा 


भील समुदाय  आपनी परम्परागत वेशभूषा में आदिवासी युवक युवती इन्दौर मे टट्या चौहरा पर उत्सवपूर्वक आदिवासियों का पर्व विश्व आदिवासी दिवस ।
 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते छत्तीसगढ़  9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते झाबुआ में 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते इन्दौर भील आदिवासी समुदाय  9 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते इन्दौर मे  गोड समुदाय  की महिलाये  9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते नरसिहपुर में 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते छत्तीसगढ़ में 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते अलीराजपुर  9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते इटासी  9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते शहडोल नागपुर महाराष्ट्र 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते 

 जबलपुर में विश्व आदिवासी दिवस

        सागर मे आदिवासी दिवस मनाते हुये 9अगस्त
    सागर के देवरी तहसील  में  9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस 
      छिन्दवाडा 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते हुये ।                 गोडसमुदाय के प्रदेश अध्यक्ष   विशन सिह परतेती 

पाताल पानी मऊ 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते हुये 
रायसेन म्र.प्र रैली 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाते हुये 

       नृत्य आदिवासियों के नरसिहपुर 
     आदिवासी मुख्य मन्त्री हेमन्त सरेन 
      तेलगंना में आदिवासियों नृत्य
झारखण्ड  के आदिवासी समुदाय में विश्व आदिवासी दिवस मनाते       वही देश दुनिया में भी आदिवासी महिलाओं की उन्नति कावले           तारिफ  है 


हमने आपको बताया है इन तस्वीरों के जरिए की आदिवासी समुदाय ने 9 अगस्त को किस प्रकार से हर्ष उल्लास के साथ मनाया देश-दुनिया में आदिवासी लोग बहुत पुराने समय से रह रहे हैं ऐसा नहीं है कि ने विकास नहीं किया विकास भी किया है लेकिन यह अपनी परंपरागत वेशभूषा परंपरागत रहन-सहन खान-पान को नहीं भूले यानी इन्होंने आज भी अपने पुरखों को आज भी अपने पुरखों जो प्रकृति में चले जाते हैं यानी कि खत्म हो जाते हैं वह इनके साथ हैं पेड़ पौधे नदियां पर्वत बनकर इनके पास है इसलिए यह उनको पूजा करतें हैं और उन्हीं के हिसाब से जैसे वह चले आ रहे थे उन्हीं के साथ से चलते हैं और प्रकृति को बचाने का पुरजोर प्रयास करते हैं कि कहीं हानियां ना हो जाए हमसे कोई ऐसी घटना ना हो जाए जिससे हमारे पुरखे नाराज हो जाएं इसी मान्यता को कुछ लोग रूढ़ीवादी परंपराओं या जादू टोना टोटका कहते हैं लेकिन आदिवासी केवल और केवल अपने पुरखों को पूजा करते  आ रहे हैं प्रकृति के बाशिंदे हैं इस दुनिया में आदिवासी पर बड़े उत्साह के साथ मनाया गया और आगे भी मनाते रहे हमें इनसे सीखना होगा यही भारत में  अनेकता में एकता है भारत में हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई हिंदू सभी  प्रकार के धर्म है और आदिवासी धर्म ही एक अलग मांग कर रहा है लेकिन आखिर यह आधुनिकता के दौर में इतने  पीछे क्यों हैं सोचना होगा देश में आज देश में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि देश का मुखिया प्रथम नागरिक आदिवासी समुदाय से है फिर भी इनके साथ अजीब सी विडंबना है विकास की कई योजनाएं हैं लेकिन विकास नहीं यह समझना होगा क्या कोई रोका है। सब है लेकिन इनका विकास नही जंगलो से  भगाया जा रहा है पता नही क्यों  शायद आप  को पता हो। खैर सवाल है और बहुत कुछ खोलते है  देखना होगा आने वाले समय में आदिवासी के सरकार से अपना विकास करते हैं या फिर आगे सब समझदार है आप सब। 

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

क्यों बनाया जाता हैं विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त को ?

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित है

     International Day of the world indigenous peoples
 इस वर्ष की थीम है
 पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और प्रसारण में स्वदेशी मुलनिवासी आदिवासी  महिलाओं की भूमिका


विश्व आदिवासी दिवस प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है 
अंतर्राष्ट्रीय कार्यदल का गठन 9 अगस्त 1982 में हुआ था पहली बैठक 9 अगस्त को हुई थी यही कारण है कि 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय कार्यदल का गठन इसलिए हुआ था कि पूरी दुनिया में आदिवासियों द्वारा प्राकृतिक सरक्षंण करने वाले आदिवासियों को उनके रक्षण के लिए दुनिया भर में कोई उपाय नहीं था इसलिए उनको बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व आदिवासी पटल पर उनके संस्था आस्तिव में आई  आदिवासी के रूप में यह दिन निश्चित किया गया 9 अगस्त को पहले कोलम्बस दिवस भी कहते थे क्यों बढे उपनिवेशवाद को खत्म करने के लिए।
विश्व आदिवासी दिवस आबादी के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व के आदिवासी लोग का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है यह घटना उन उपलब्धियों और योगदानों को भी स्वीकार करती है जो मूल निवासी लोग पर्यावरण संरक्षण जैसे विश्व के मुद्दे को बेहतर बताने के लिए करते हैं

विश्व में आदिवासी
विश्व में आदिवासी समुदाय की जनसंख्या लगभग 37 करोड है जिसमें लगभग 5000 अलग-अलग आदिवासी समुदाय और इनकी लगभग 7000 भाषाएं आदिवासी समाज के उत्थान और उनकी संस्कृति व सम्मान को बचाने के लिए हर साल 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के तौर पर मनाया जाता है भारत समेत विश्व के कई देशों में आदिवासी जाति के लोग रहते हैं उनका रहन-सहन खान-पान और रीति-रिवाज और पहनावा आदि बाकी अन्य लोगों से अलग होता है समाज की मुख्यधारा से कटे होने की वजह से दुनिया भर के आदिवासी लोग आज भी पिछड़े हुए हैं हालांकि समाज की मुख्यधारा में जुड़ने और आगे बढ़ाने के लिए देश दुनिया में तमाम तरह के सरकारी कार्यक्रम और सरकारी कार्य चलाए जा रहे हैं 

भारत में देश की आजादी में भी आदिवासियों का बड़ा महत्व है आजादी  की लड़ाई के समय बिरसा मुंडा झारखंड छोटानागपुर क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई थी मध्यप्रदेश में भी आदिवासियों ने विशेष भूमिका निभाई थी रघुनाथ शाह शंकर शाह तोप के मुंह में बांधकर उड़ा दिया गया था हर क्षेत्र में आदिवासियों ने अपना अंग्रेजों के  प्राणों की आहुति दी हैं। नागपुर का विद्रोह छोटा संथाल विद्रोह गारो खासी की लड़ाई भील प्रदेश का आंदोलन आंध्र प्रदेश के गोंड झारखंड के आदिवासी समुदाय संथाल समूह का विद्रोह तमाम प्रकार की लड़ाइयां लड़ी है देश की आजादी में आदिवासी समुदाय ने 1603 से स्वतन्त्र तक 

मई 1995 - 2004 को पहला अंतरराष्ट्रीय दर्शको घोषित गया था यूएनओ ने वर्ष 2004 में 2015 को दूसरे अंतरराष्ट्रीय दर्शक की घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 को संकल्पित 49/ 214 द्वारा प्रतिवर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाएगाज़्यादा जानकारी को पढों

बुधवार, 3 अगस्त 2022

गोंड समुदाय की समृद्ध विरासत



गोंड समुदाय में कई  उप जनजातियां हैं।  हालांकि सांस्कृतिक और नस्लीय तौर पर यह सभी एक जैसी हैं।
नस्ल के तौर पर गोंड समुदाय की उत्पत्ति को लेकर कई तरह के सिद्धांत पेश किए गए हैं हालांकि जाने-माने मानव विज्ञानी  हीमेनडोफ्र   की राय है कि हिंदू और अन्य समुदाय के लोगों ने इस जनजाति  आदिवासी समुदाय का नाम "गोंड,  रखा आमतौर पर यह लोग अपने लिए इस शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं मतलब इनके बीच  यह हमेशा अपने आपको कोईतुर या कोंयावासी कहते हैं। 
गोंड समुदाय की सामाजिक संरचना काफी पुरानी और अनूठी है । यह व्यवस्था इनके के गुरू पुवर्ज पहाँदी  कुपार लिगो  द्वारा स्थापित की गई थी   
     गोंडसमुदाय के आदिगुरु  तिरुपारीपहाँदी कुपार लिगो  
 गोंडसमुदायके आदिगुरु तिरु पारी पहाँदी कुपार लिगों का चित्र

यह व्यवस्था अपने अनोखे पन के साथ अभी तक चली आ रही है। समय-समय पर दूसरे समुदायों द्वारा कई तरह के यह हस्तक्षेप सामना करने के बावजूद गोंड समुदाय अपनी परंपराओं के साथ जीवन यापन कर रहा है। और गोंड समुदाय से जुड़ी सामाजिक व्यवस्था के अध्ययन से पता चलता है कि यह समुदाय अब अपने सामाजिक विकास के शुरुआती चरण से काफी आगे बढ़ चुका है जबकि इससे जुड़े कुछ तबके सभ्यता के अपेक्षाकृत आधुनिक चरणों से भी जुड़े चुके हैं इस समुदाय में 750 गोत्र हैं 2250 कुल देवी देवता हैं और इन 750 गोत्रों को  सभी गोत्रों को अलग-अलग वृक्ष की रक्षा के लिए  उत्तरदायित्व किया गया है अर्थात इनके गुरु पहाँदी कुपार  लिंगो द्वारा यह व्यवस्था इनको दी गई है।
परिवार
गोंड समुदाय की सबसे छोटी इकाई परिवार है। एक समान देव पूजने वाले या कुटुम परिवार बढ़ जाने के बाद कई परिवार एक के समूह को  गोत्र कहा जाता है, गोत्र या कुल में कई परिवारों का समूह होता है जिसे यह इन्हें टोटम कहा जाता है मुख्य रूप से गोत्र पर निर्भर होते हैं जैसे किसी  गोत्र अडीयाम  आर्मो अहोम,ओयमा,ओलाडी,उडाम एलाम, तिडगाम,मरकाम, इन गोत्रों के जो भी सगाजन होंगे जिनकों  संगापाढी, भी  कहा जाता है गोंड भाषा में इन गोत्र धारियों की पहचान के लिए इनका एक झंडा होगा इनकी पहचान के लिए इनका एक गढ़ होगा देव संख्या 6 मानी  गई है।
यदि 6 देवधारी लोग शादी के लिए संबंध बनाएंगे तो केवल और विषम संख्या के पास केवल 3,5,7 देव के पास आपनी शादी करेगें 
इसी प्रकार से इनको इनके जो 750 गोत्र मिले हैं उन्हीं में इनका आपस में विवाह होता रहता है इसलिए यह जो इनकी परंपरा है यह इनकी सामुदायिक परंपरा है जानिए खुद में इतने समृद्ध हैं कि इन्हें किसी की आवश्यकता नहीं है क्योंकि विवाद सम्बन्ध  से परिवार की उत्पत्ति होती है और यही यह बात सिद्ध कर देती है कि गोंड समुदाय खुद में एक बेहद समृद्ध  समुदाय है 
प्रत्येक गोत्र प्रकृति में किसी ना किसी पेड़ की रक्षा करता है इस प्रकार से भी इनको प्रकृति का रक्षक माना गया है इस प्रकार से इस समुदाय में कभी भी दहेज की प्रथा नहीं रही उल्टा वर पक्ष के लोग लड़की पक्ष का मूल्य देते हैं। हालांकि आज समय के अनुसार और दूसरे लोगों को देख  कर कही कही थोडी बहुत प्रथाओं में परिवर्तन हुआ है  लेकिन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आज भी इसी प्रकार की प्रथा है परंपरागत रूप से दहेज बिल्कुल भी ना लिया जाता है ना दिया जाता है।

महिलाओं की स्थिति

गोंड समुदाय में महिलाओं की स्थिति हमेशा सम्मानीय रही है उदाहरण, के रूप रानी दुर्गावती गोंड साम्राज्य की सबसे प्रतापी सम्राक्षी  जबलपुर गढ़ मंडला की सम्राक्षी ,भोपाल की रानी कमलापति रानी गोंडवश राजघराना वंश की थी 
मोटे तौर पर महिलाओं की हैसियत पुरुषों के बराबर ही है वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं हर काम में हाथ बढाती हैं जीविकोपार्जन में भी महिलाओं की अहम भूमिका होती है ज्यादातर घरेलू काम महिलाएं करती हैं वे बच्चों एवं और पशुओं को देखभाल करती हैं साथ ही परिवार के लिए खाना भी बनाती हैं परिवार के सभी अहम फैसलों और विवादों में पुरुष अपनी पत्नी से सलाह  लेते हैं इनकी राय का भी सम्मान करते हैं महिलाओं को कुछ रीति-रिवाजों से दूर रखा जाता है कुल मिलाकर गोंड महिलाओं में अपने समाज में हैसियत सम्मानजनक होती है। इनमें पर्दा प्रथा नहीं है

विवाह
पारंपारिक और समुदाय में कई तरह के विवाह प्रचलन में गोंड समुदाय में खून के रिश्तेदारों के बीच शादी का  प्रचलन नहीं है अर्थात एक गोत्र में शादी नहीं करते हैं यह इनका टोटम होता है टोटम एक दूसरे में शादी नहीं करेंगे चाहे कुछ भी हो जाए  भाई बहन ही कहलाएंगे।   मामा और बुआ के बच्चों के बीच शादी की परंपरा है लड़का लड़की की मर्जी के अलावा माता-पिता की सहमति भी बहुत जरूरी होती है। गोंडजनों में इनकी जो शादी कराने वाला मुठबा या भुमका जिसे ये बैंगा कहते है विवाह करवाता है इनकी परंपराओं के अनुसार इनकी शादी अधिकतर दिन में ही होती है गोंडसमुदाय में विधवा विवाह की भी अनुमति है ऐसी कई परंपराएं जो गोंडसमुदाय  को इनके अलग होने के कई प्रमाण देती है जैसे 
दूध लौटावा प्रथा ,जमाई विवाह, गोल गधेड़ो विवाह, और भी अन्य परंपराएं हैं


त्योहार

गोंड समुदाय के धार्मिक त्योहारों में अखाडी,पोला, जिवाती,  दिवाली, नवोतिन्दाना दशहरा और फाग आदि शामिल हैं इनमें से कई त्योहारों का संबंध खेती के मौसम से है समुदाय से जुड़े त्यौहार सामूहिक रीति-रिवाजों पर आधारित होते हैं इन त्यौहारों को काफी उत्साह के साथ मनाया जाता है इनके त्यौहार बुनियादी रूप से बिल्कुल हट के इनकी  परंपराओं के हिसाब से ही होते हैं।


बलि
और समुदाय में अपने देवी-देवताओं को बलि भी चलाते हैं समुदाय के लोग देवी-देवताओं खुश करने के लिए बकरा और मुर्गे की बलि भी देते हैं बीमारी से मुक्ति के लिए बलि देने का प्रचलन भी है माना जाता है कि बलि के जरिए इन शैतानी तत्वों को खात्मा मुमकिन होगा जो गांव के लोगों को नुकसान पहुंचाते हैं

मृत्यु

मृत्यु को लेकर गोंड समाज और समुदाय की अलग अवधारणा है समुदाय का मानना है कि मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है इसका संबंध देवी शक्तियों से है  समु़दाय बीमारी और मौत दोनों को देव शक्तियों का प्रभाव बताता है शुरुआती में इस समुदाय के शव को दफनाने की परंपरा थी हालांकि गोंड समुदाय द्वारा शव को जलाने की परंपरा शुरू करने के बाद से दोनों परंपराएं प्रचलन में है मगर अधिकतर बाहुल्य क्षेत्रों में जहां गोंड समुदाय आदिवासी लोग निवास करते हैं वहां पर दफनाने की ही प्रथा आज भी  है आज भी चलन में है।


सांस्कृतिक पहलू व देव पुजा सेवा अर्जी गोगो

गोंडसमुदाय ने अपनी सामाजिक संरचना में खुद की संस्कृति परंपरा विकसित की है इसमें अन्य संस्कृतियों को ज्यादा महत्व नहीं है इनकी संस्कृति परंपरा है सरल और वाचिक  परंपराओं के जरिए इन्हें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की भी पहुंचाया जाता है इनकी संस्कृति अपने आप में बेहद समृद्ध है प्राकृति के अनुसार चलने वाले प्रकृति पूजक प्रकृति को ही सर्वोपरि बताने वाले ।इनकी विवाह पद्धति इन के मरने होने की प्रथाएं इनकी नाते रिश्तेदारों से मिलने जुलने के तरीके इनके और अन्य कई प्रकार की ऐसी विशेष पूजा है जो केवल और केवल आदिवासी समुदाय में ही होती हैं। इनका मूल मंत्र जय सेवा जय बड़ा देव जो इनके इष्टदेव होते हैं वह बड़ादेव  गोडीभाषा में फंडापेन  कहतें हैं  इनका झंडा सतरंगी झंडा धर्म ध्वजा इन के देव, बडादेव, खैरोताई, मुढवाबाबा,गोंडबाबा, मेघनाथ बाबा,रावणबाबा,
कुआरा भीमालपेन, ठाकुर देव और इनके जो भी देव घूमने की प्रक्रिया होती है या देव का परिक्रमा चक्कर लगाने की प्रक्रिया होती है उसमें यह लोग हमेशा (एंटीक्लॉक )घड़ी  विपरीत दिशा में ही घूमते और यही प्रकृति के अनुसार चलते हैं गोंड समुदाय के हर अवसर के अलग-अलग देवी देवता भी होते हैं जिन्हें यह उन्हें अपने स्तर से खुश रखते हैं पूजा पद्धति से।



 भोजन 

गोंड समुदाय के सामान्य लोगों के खान-पान की आदतें कुछ-कुछ एक समान हैं भोजन बनाने के तरीकों में भुजना,उबालना,सेखना आदि शामिल है समुदाय के लोगों का मुख्य भोजन बाजरा और चावल, सभी प्रकार की दालें, मक्का ,ज्वार ,कोदो ,कुटकी ,समा, भी खाते है  वह महुआ के सूखे फलों को भी माँड में मिला लेते हैं समुदाय के लोग महुआ से 18 से ज्यादा प्रकार के व्यंजन तैयार करने की कलाओं में निपुण हैं समुदाय के लोगों के बीच बाजरे और गेहूं की रोटी काफी लोकप्रिय है यह लोग आमतौर पर मांस भी खाते है  जो प्राकृतिक चक्रण  में आवश्यक  हैं । और भी कई प्रकार के प्राकृतिक जड़ी बूटियों प्रकृति से जुड़े बरसात के समय नई नई फसलों जड़ी बूटियों से निर्मित सब्जियां इनको पहचान होती है क्षेत्र के हिसाब से जड़ी बूटियों की भी इनको अच्छी खासी पहचान होती है।
मऊ से निर्मित पेय पदार्थ  बनाना जानते हैं। इनको बांस पोट्टो की सब्जी बरसात के समय मिलने वाले भी पसंद होती हैं

गीत और नृत्य 

गोंड समुदाय के गीतों में उनके जीवन की कहानी होती है अलग-अलग मौसम और अवसरों के लिए अलग-अलग राग होते हैं गीतों में काफी जानकारी होती है और समुदाय में जुड़े मुख्य तौर मैं कर्मा रेला रेला, रेला रेला ,डंडा ,छड़ी, मदारी,हुल्की, की सुवा, आदि शामिल है गीत और नृत्य के साथ साथ समुदाय कई वाद्य यंत्रों,का भी इस्तेमाल करते हैं जैसे किकर, बांसुरी,झाझ ,आदि समुदाय की गीत और नृत्य के जरिए अपनी भावनाओं को बयां करते हैं कई नृत्य की काफी तेज है इससे ये भी काफी स्वस्थ रहते हैं यहां तक कि वह यंत्रों में जो धुन बजती है उसका स्वर भी काफी ऊंचा होता है उनके गीत में बहुत सरल था और दुर्लभ सुंदरता होती है और हजारों वर्षों से परंपरा का हिस्सा रहा है बाहरी परंपराओं से बिल्कुल प्रभावित नहीं है और सदियों से इनका आकर्षक और अनोखा पर बरकरार है

घोटुल 
शिक्षा के केंद्र आदिवासी समुदाय के 

गोंड समुदाय के पारंपरिक  घोटुल  का इस्तेमाल समुदाय के लोगों के बीच अनुशासन  की भावना विकसित करने के लिए किया जाता था मुलाकात का मंच नहीं था। जैसे कि कुछ विद्वानों गोंड समुदाय के  इसके बारे में बताया कि यह ज्ञानार्जन का केंद्र था इसे धार्मिक मान्यताएं भी प्राप्त थी ऐसे दौर में ज्यादातर जगहों पर शिक्षा संस्थान नहीं थे तब यह बहुत प्राचीन गोढुल प्राकृतिक संस्कृति की शिक्षा भी यहीं पर दी जाती थी यह उनका केंद्र था समाज में कैसे जीवन यापन करना है समाज के बुद्धिजीवी लोग यहां पर बताते थे यहां से जुड़ी कई मुहावरे कहावतें पहेलियां हैं और साथ-साथ यहां पर वन और पर्यावरण जड़ी बूटियों शिकार और समस्त प्रकार के सांसारिक जीवन के बारे में भी शिक्षा दी जाती थी खुला मंच होता था विचारों का आदान प्रदान किया जाता था मानसिक और शारीरिक रूप से यहां पर उन को मजबूत करने के उपाय बताए जाते थे यह एक युद्ध कलाओं के लिए भी घोटुल प्रथा जानी जाती थी
खुला मंच गोंडसमुदाय की लड़का लड़कियां युवा साथी वृद्धजन महिला पुरुष सभी यहां पर आ सकते थे और सभी अपने विचार रख सकते थे युवाओं के लिए

हस्तकला
गोंड समुदाय के लोग हस्तकला में माहिर होते हैं यह लोग दीवारों पर खूबसूरत पेंटिंग और फूलों की डिजाइन भी बनाते हैं
समुदाय के लोग अपने घरों की दीवारों पर पेंटिंग बनाते हैं जिसमें जेमिति डिजाइन और पेड़ पौधे एवं जानवरों के चित्र शामिल है समुदाय के लोग सजावट का काम भी काफी अच्छा जानते हैं जाहिर तौर पर गोंड संस्कृति संरक्षण के योग्य है दीवारों और दरवाजों पर ज्यामिति  चित्रों वाली डिजाइन की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और इनकी जड़ें प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता में मौजूद हैं

गोंडी भाषा
गोंड समुदाय के लोग रोजमर्रा की जिंदगी में गोल गोडीबोलते हैं काडवेल ,जूले, ब्लाँन्ज,  और ग्रियर्सन ,जैसे भाषा वेदों ,के मुताबिक यह द्रविड़ भाषा ,से भी पहले के दौर की भाषा है उनके मुताबिक द्रविड़ भाषाओं की उत्पत्ति इसी भाषा से हुई है  ।गोंड समुदाय के लोग आपस में अपनी मातृभाषा में ही बात करते हैं हालांकि जब यह बहार लोगों से बात करते हैं तो बोल चाल की मिला जुली हिंदी का इस्तेमाल करते हैं भाषा बोलते है। 

गोंड समुदाय के लोगों ने बेहतर और उच्चस्तरीय सभ्यता विकसित की थी लिहाजा उन्हें जनजातीय समुदाय कहना उचित नहीं होगा गोंड समुदाय मध्य भारत का शासक वर्ग ।।

शासक रहा है  महल तलाब कलाकृतियों के अवशेष अभी मध्य भारत में मौजूद हैं ऐसे में कहा जा सकता है कि मध्य भारत के गोंड समुदाय की संस्कृति विरासत काफी समृद्ध है

आचार्य मोतीराम कंगाली की पुस्तक
योजना जुलाई 2022 की पुस्तक

मंगलवार, 2 अगस्त 2022

गोंड समुदाय में विवाह

अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता को बनाकर रखा वह प्रकृति से जुड़ा प्राप्ति के परिपूर्ण भारत में आदिवासियों विवाह कैसे होते हैं

हम बात कर रहे हैं  गोंड समुदाय की
 गोंड समुदाय  जनजाति या गोंड आदिवासी लोग भारतीय राज्यों मध्य प्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार और ओडिशा में फैले हुए हैं। वे द्रविड़ियन बोलते हैं और उन्हें अनुसूचित जनजाति श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। गोंड शब्द को तेन्दु शब्द कोंडा से लिया गया है, जिसका अर्थ है पहाड़ी। पहाड़ के समान  मजबूत  रहने वाले


विवाह क्या होता है
विवाह, जिसे शादी भी कहा जाता है, दो लोगों के बीच एक सामाजिक या धार्मिक मान्यता प्राप्त मिलन है जो उन लोगों के बीच, साथ ही उनके और किसी भी परिणामी जैविक या दत्तक बच्चों तथा समधियों के बीच अधिकारों और दायित्वों को स्थापित करता है

मध्य भारत के आदिवासी समुदाय में विवाह गोंड समुदाय 
यह  मध्य प्रदेश के सभी जिलों में फैली हुई है लेकिन नर्मदा के दोनों और विंध्य और सतपुड़ा के पहाड़ी क्षेत्रों में इसका अधिक घनत्व है राज्य के बैतूल, छिंदवाड़ा, होशंगाबाद बालाघाट, मंडला,शहडोल जिलों में गोंड समुदाय  है

निवास स्थान लगभग मध्य प्रदेश के संपूर्ण जिलों में मध्य प्रदेश की चर्चा में
जनसंख्या के हिसाब से मध्य प्रदेश में 21% हिस्सेदारी रखते हैं
आमतौर जिनका मध्यपदेश के क्षेत्र में सम्पूर्ण मध्यप्रदेश कहीं ना कहीं राज हुआ करता था   राजगोंड  कहा जाता है
और इन्हीं के क्षेत्र में इन्हीं के लोग जो प्रजा के रूप में निवास करते थे खेतीबाड़ी करते थे उन्हें धुरगोंड कहा जाता है
समानता अब दोनों में शादी विभाग के संबंध होने लगे हैं

 मध्यप्रदेश के जिलों में गोंड समुदाय के विवाह कई प्रकार पद्धति या रस्मो से होते हैं

कई प्रकार के विवाह प्रचलित थे प्राचीन समय में  समुदाय में जो आज भी कहीं कहीं इन्हीं पद्धतियां  से विवाह संपन्न होते हैं
जैसे  1 चढ विवाह
     2 दूध लौटावा विवाह
     3पठौनी विवाह
     4भगोली विवाह 
     5लमसेना विवाह
     6पलायन विवाह 
     7हल्दी विवाह 
     8गुरावट विवाह 
     9सेवा विवाह
     10अपहरण विवाह 
      11 गार्धव विवाह
      12हठ विवाह
       
  चढ विवाह 
        दुल्हा दुल्हन छायाचित्र
गोंड समुदाय  भारत की बड़ी जनजाति आदिवासी समुदाय  मजबूत गोत्र व्यवस्था सम और विषम गोत्र में बंधी होती है दो भाग में दो परिवारों के बीच शादी होती है रस्मों और गीतों की व्यवस्था इस शादी में आदमी यहां पर खजूर के पेड़ की डाली और खजूर के फल टागें हुआ कमर में घूमता है यह दोनों परिवार के संपर्क में होता है मलेहा कहा जाता है यह बरात आने के 2 से 3 दिन पहले लड़का वालों के यहां से आ जाता है लड़की के घर 
गोंड आदिवासी समुदाय व्यवस्था में सहयोग और लोकतांत्रिक मूल्य बहुत गहरे हैं मसलन जिसके घर शादी होती है उससे कहीं ज्यादा समाज की जिम्मेदारी गांव के लोगों के बीच काम का बंटवारा हो जाता है लोग अपना अपना काम जिम्मेदारी से करते हैं जैसे कुछ लोगों का काम पानी लाना होता है और कुछ लोगों का काम खाना बनाना होता है शादी में सीधे शादी तरीके से होती है शादी के दिन कुछ खास हो ऐसा जरूरी नहीं है खाने में दाल चावल रांगी बनाए जाते हैं रोजमर्रा के कपड़े में ही अधिकतर लोग नजर आते हैं दिखावा और आडंबर कुछ भी नहीं है इसके बाद भी यह अपनी शादी में बहुत मौज मस्ती करते हैं
गोंड आदिवासी समुदाय में ना तो ज्यादा दिखावा और ना ही फिजूल खर्चा होता है आपसी सहयोग और भाईचारे से ही शादी विवाह संपन्न किए जाते हैं।
पर्यावरण को एक नए पैसे का नुकसान नहीं और आदिवासियों की सामाजिक और धार्मिक अवधारणा है प्रकृति के साथ मजबूती से जुड़ी होती है 
अलग-अलग अवसर पर अलग-अलग पूजा होती हैं मसलन जैसे जंगल देव गांव का देव पहाड़ देव और दूल्हा देव किस धार्मिक जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति को गामता कहां जाता है यही  मंडप तैयार करता है
सरसा छुलाई की रस्म होती है करसाना हिलाना महिला एवं पुरुष करते हैं इसमें एक मटके के घड़े में धान भरी जाती है और एक मटकी की घड़ी में खलाते हुए पूर्वजों के यहां से जहां पर इनका देव बैठा होता है वहां से लाते हैं दूल्हा और दुल्हन दोनों इसमें दान देते हैं और जो दुल्हन या दूल्हे की बहन होती है से पूछती है कि हम को क्या दोगे गीतक रूप में के रूप में सभी गांव वालों को लड़का लड़की के परिवार वालों को खाना कराया जाता है और दूसरे दिन लड़का लड़की मंडप में हरे मंडप में गामता   इनकी शादी पड़ता है और उसके बाद शादी और विदाई फिर लडके के यहां चकलामाझी और वह अपने गांव को यानी भोजन करवाता है।
कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली
शादी -मठामिग
दूल्हा -नवडा
दुल्हन -नवडी
चकलामाजी -लड़के के घर पर होता है एक प्रकार की रस्म
विदाई -सार नियारा हतो ना
 
     विवाह के बाद दुल्हा दुल्हन नाचते हुये छायाचित्र 
2 दूध लौटावा  विवाह
जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं गोंड समुदाय में गोत्रावली बहुत मजबूत होती है मामा और बुआ के बच्चों के बीच शादी संबंध हो ना उसी का एक परिणाम है और इसी प्रकार से इस शादी विवाह जो कि दोनों परिवार की रजामंदी से होता है इसे दूध लौटा विवाह कहते हैं

3 सेवा विवाह 
लड़की के घर पर रहकर लड़की के परिवार वालों को खुश करता है उनके यहां काम काज हर काम में काम बटाता है। तब जाकर वह कहीं खुश होकर अपनी लड़की लड़का विवाह कर दे देते है 

4 लमसना विवाह
लड़की के यहां रहने लगता है शादी के बाद लड़का।  खेती-बाड़ी करने लगता है वहीं पर रह कर अपना जीवन यापन करता है शादी करने के बाद  ससुराल में 

5पलायन या भगोली विवाह 
लड़का लड़की भाग कर शादी कर लेते हैं फिर लड़के  के परिवार को लड़की के परिवार को दंड स्वरूप कुछ ना कुछ देना होता है इस जरुरी नही कोई कीमती चीज ही हो। शर्त अनुसार या इनकी पचायंत के अनुसार जब मान कर दोनों परिवार में शादी होती है  इस विवाह को भगोली विवाह भी कहते है 

 5पठौनी विवाह
इसमें लड़की बरात लेकर लड़के के यहां जाती है।

इसी प्रकार से सभी,विवाह पद्धतियों की अलग-अलग मान्यता है और खासकर अब इन आधुनिकता के दौर में कुछ ही पद्धतियां सीमित रह गई हैं। हालांकि जैसे-जैसे शिक्षित होते जा रहे हैं या अपनी विवाह के मूलभूत सांचा तो सजायें हुये मगर इनके विवाह ने आधुनिकता ने भी प्रवेश किया है खान पान और अन्य स्थानों 
हालांकि अपने अस्तित्व में बना हुआ है आदिवासी समाज
विवाह पद्धति आदिवासी समुदाय में। हल्दी चावल का बड़ा महत्व होता है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदाय के लोगों से 
 पुस्तक   कोया पुनेम गोंडियन गाथा


गुरुवार, 21 जुलाई 2022

गोंड समुदाय में मृत्यु पर तीसरा पूजन होता है

ज्यादा जानकारी के लिए वीडियो देखे औरआज हम जानेंगे भारत की सबसे बड़ी जनजाति  गोंड जनजाति में मृत्यु के बाद गोंड जनजाति कैसे उसको देव मिलान क्या और कैसे ये आपने लोगो को समाज देव तुल्य मानकर देव में मिलान करते हैं


नमस्कार दोस्तों वैसे तो आदिवासी समाज संपूर्ण  भारत में जैसे मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र झारखंड तेलंगाना आंध्र प्रदेश उड़ीसा राज्यों  मुख्य रूप से है और आदिवासी समाज में कई समुदाय हैं आज हम बात करेंगे आदिवासी के मध्य प्रदेश के दूसरे नंबर के और भारत के प्रथम नंबर के समुदाय गोंड  समुदाय के बारे में

मध्यप्रदेश में गोंड जनजाति मूलता नर्मदा नदी के दोनों ओर निवास करती है जिसे ये कोयातुर लोग नर्मदा ताई कहते है  आज हम आपको ले चलेंगे छिंदवाड़ा जिले के महाराष्ट्र सीमा से लगे हुए गांव बड़कुई जहां पर हमने देखा समझा और जाना कि किस प्रकार से आदिवासी समुदाय  वैसे गोंड  समुदाय अपने आप को कोयतुर या कहते है । कोया का अर्थ है गर्भ कोख से जन्म लेने  वाला प्राकृतिक पूजक और पूर्वज पूजक अपनी संस्कृति में मिलान करता है और उनकी मौत पर किस प्रकार से परिवार जनों में दुख व्यक्त किया जाता है और उसकी याद में किस प्रकार से उसको अपनी याद में सदैव स्मृति में रखा जाता है गोंड  समुदाय

सबसे पहले तो आदिवासी समाज में यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसको मिट्टी में दफनाया जाता है जिसे यह लोग बाबा सातुर  इनकी गोडी भाषा मे जाना हम ने।हम हिंदी में कहेंगे कि मिट्टी देना हम आपको बता दें मध्यप्रदेश के गोंड समुदाय में गोंडी भाषा जो इनकी मातृभाषा होती है इनकी संस्कृति इनकी सभ्यता  की प्राचीन भाषा जिसे यह गोंडीभाषा कहते हैं। वह बोली जाती है  आमतौर पर छिंदवाड़ा महाराष्ट्र की पट्टी महाराष्ट्र सीमा से सटे मध्य प्रदेश के और जो गोंड समुदाय बाहुल में निवास करती है  सिवनी बालाघाट बैतूल खंडवा मंडला डिंडोरी शहडोल अमरकंटक अनूपपुर  मण्डला जबलपुर  के  गांव  में और महाराष्ट्र जिले के  अमरावती चंद्रपुर कई अन्य स्थानों पर भी लगे हुए आसपास के क्षेत्रों में जिले में
जब कोई व्यक्ति खत्म हो जाता है यानी मृत्यु हो जाती है तब उसकी लिए सबसे पहले पूरे परिवार जन के सदस्य जैसा कि आमतौर पर नाते रिश्तेदार दूर-दूर के सभी रिश्तेदार और अन्य समाज से हटकर सामाजिक व्यक्ति घर कुटुम परिवार के महिला पुरुष बच्चे युवा सभी पहुंच जाते हैं होता है मरने वाले के घर पहुंच जाते हैं और उससे उसके घर वालों को सांत्वना देते हैं हैं 
फिर जहां भूमि होती है जहां इनकी खेती होती है जहां इनका खेत होता है वहां पर व्यक्ति के आकार अनुसार गड्ढा किया जाता है समस्त परिवार जन के सदस्य इस मिट्टी के लिए उस शव  को ले जाते हैं

 उस व्यक्ति को उस मिट्टी में एक-एक करके सभी प्रणाम करते हुए मिट्टी देते हैं और उस गड्ढे में यानी कि उसे मिट्टी दे देते हैं प्राकृतिक में लीन  प्रकृतिमय  कर  देते हैं
उसके बाद परिवार के सभी सदस्य अपने अपने घर वापस चले जाते हैं
या जिनको मुकाम लेना हो मुकाम का अर्थ गोंडी भाषा में ठहरना  होता है है
यहां पर यह कतई नहीं है कि कोई उनके घर में रुक नहीं सकता है बिल्कुल आराम से आप उनके घर में रुक सकते हैं आपकी सुविधा के अनुसार वह लोग अपने घर में व्यवस्थाएं रखते हैं


तीसरे दिन होता है तीसरा पूजा होता है तीसरा तीसरा पूजा यानी कि 

यहां की ऐसी प्रथा है गौड समुदाय में
दूरदराज से आने वाले आसपास के गांव से आने वाले सारे  रिश्तेदार घर से लाते हैं चावल और दाल
इन सभी के द्वारा इकट्ठा किया गया चावल और दाल
इनके मुठवा द्वारा पकाया जाता है जो इनका इन समुदाय की जो  पूजा करता है पूजा पाठ का कार्य करता है उसे ये लोंग मुठवा  या भुमका कहते हैं
इकट्ठा करके उस दाल चावल को पका लेने के बाद पूजा के लिए थाली छैवला पेड के पत्तों से तैयार की गई हुई पत्तल तैयार की जाती है जहां पर व्यक्ति को मिट्टी दी है वहां पर जाते हैं सभी परिवार के जन सबसे पहले घर की महिलाओं द्वारा थाली लेकर मरने वाले जहां पर मिट्टी दी है उसके लिए वहां पर जाते हैं यह लोग सारी की सारी घर की महिलाएं ।इस पूजा में महिलाओं का विशेष स्थान होता है

     गोड समुदाय की महिलाये स्थान छिन्दवाडा 
 

जो पका पकाया चावल होता है महिलाओं द्वारा उस व्यक्ति को बड़े प्यार से उसकी मिट्टी स्थल (धूप पारा) छिटकी और हिंदी में भोग लगाने की प्रथा के उसे श्रद्धा पूर्वक है एक-एक करके जितनी भी उसके परिवार जनों में महिलाएं होती हैं सर्वप्रथम उसकी बहन उसकी बेटी ,पत्नी ,भाभी, उसके और नाते रिश्तेदार,महिलाओं से उस व्यक्ति से जितने भी प्रकार से संबंधित होते हैं, उसको खिलाते छिटकी करते हैं और रो-रोकर उसको याद   एक-एक पल को
 यह वह स्थान होता है जहां व्यक्ति को मिट्टी दी गई है पूरे दाल चावल भात का छिटकी करते हुए भोग लगाते हुए

यह लोग केवल इसी परंपराओं के द्वारा अपने पूर्वजों को  पुजा करते  हैं

उसके बाद सभी लोग वापस जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई है उसके घर पर वापस आते हैं घर में जो दाल चावल सभी रिश्तेदारों के द्वारा लाए  जाते हैं उसकी याद में पकाए जाते हैं उसकी यादों को एक-एक करके सभी अपने अपने शब्दों में बताते हैं और उस याद भरे पल को यह लोग उसकी याद में सभी बैठकर जो भी इनके घर में उपलब्ध होता है दाल चावल मिर्ची अचार जो भी व्यक्ति की गुंजाइश के हिसाब से खत्म होने वाले परिवार की गुंजाइश के हिसाब से जो उन से  बन पाता है वह सारी की सारी व्यवस्था भोजन की व्यवस्था वह लोग करते हैं इसमें किसी भी प्रकार का सामाजिक दबाव नहीं होता है पूड़ी सब्जी रायता मिठाई खिलाने की कोई प्रथा नहीं है यह भोजन जो होता है 3 दिन में होता है अगर आपके पास व्यवस्था है तो आप पक्का भोजन भी करा सकते हैं और अगर आपके पास व्यवस्था था नहीं है तो आप कच्चा भोजन करा सकते हैं और यदि किसी को या भोजन अभी नहीं कराना है तो कुछ समय बाद इनके यहां एक प्रथा होती है जो मर चुका  होता  है उसको यह लोग अपने हिसाब से अपने देवों में मिलाते हैं जिसे यह देव मिलान कहते हैं इसके लिए इन  का मुठवा इनका खुद का भुमका इनका खुद का पुजारी होता है जिसके द्वारा यह सारी क्रिया कर्म और सारी पूजा की जाती है यह प्रथा रूढ़ीवादी प्रथा आदिवासियों में ही प्रचलित है अनादि काल से चली आ रही है प्रथा को तीसरा  कहा जाता ,"देवमिलान एक सामुदायिक प्रथा है जिसे दूसरे शब्दो मै पत्थरगढी कहां जाता है यह हैhttps://youtube.com/channel/UCbAA-i1_JOIF-Q7EpUgp2hQ देखे विडियो और जाने

ये सारी जानकारी गोडसमुदाय के लोगों से 

बुधवार, 15 जून 2022

पुलिस यदि ज्यादा परेशान करे तो किसी कारण से या किसी कारण से कुछ ऐसे नियम जिनको आप जाने आपको पुलिस पर वजह परेशान नहीं करेंगे

सबसे पहले तो हमें यह पता होना चाहिए कि पुलिस का जो काम होता है वह केवल और केवल हमारी सुरक्षा समाज में असामाजिक तत्वों को उत्पन्न होने से रोकना भी इनका काम होता है
पुलिस यदि किसी कारण से आपको परेशान करती है या आपके घर आती है या आपसे कुछ पूछती है या आपसे कुछ कहती है तो आप सबसे पहले उनकी बात सुने आराम से उनकी बात का पूरी तरीके से सुने समझें और उसके बाद उनसे कुछ भी सवाल कर सकते हैं जैसे
खासकर हमारे समाज में जब किसी के घर में पुलिस आती है तो आ कारण ही नहीं बाद में अपना सोचने लगते हैं कि इस क्या पुलिस की मोबाइल क्या कारण हो सकता है क्या वजह है पुलिस वाले इसको क्यों मिलने आए हैं इसमें कुछ किया है क्या हो सकता है पुलिस वाले आपको कोई सूचना देने आए हो किसी कोर्ट का सम्मान देने आए हैं किसी अच्छी बुरी चीज के बारे में बताने आए हैं तो सबसे पहले ऐसी बात ना सोचे किसी के भी बारे में और अपराध या किसी भी प्रकार की अनहोनी किसी के साथ भी हो सकती है इसलिए कभी भी इस प्रकार की सोच किसी भी आस-पड़ोस और किसी भी व्यक्ति को ना रखना जो अपराधी प्रवृत्ति हैं उनको छोड़कर वह भी एक इंसान हैं संगीन अपराध करने वालों को तो कोई भी अपराध या कोई भी समाज बात नहीं करता

 
पुलिस आपसे कहे कि आपको हमारे साथ थाना  चलना  है?
आप पुलिस से पूछ सकते हैं कि आखिर मामला क्या है बड़े आराम से
पुलिस से जाने का आपका अधिकार है और पुलिस आपको उसके बारे में बड़े आराम से बताएगी उसने बिल्कुल भी डरने की कोई बात नहीं है और किसी भी प्रकार की पुलिस वाले के बारे में कि वह पुलिस वाला ऐसा अगर पुलिस वाला पैसा है बिना वजह आराम से बिना डरे आप पूछ सकते हैं कि कल मुझे आप थाने क्यों लेने आए हैं मैंने क्या किया है

यदि वह आप को गिरफ्तार करते हैं तो
भारतीय संविधान के अनुसार अगर कोई भी पुलिस वाला आपको गिरफ्तार करता है किसी भी मामले में तो वह बिना हथकड़ी के आप को ले जाएगा सबसे पहली बात तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई है हां अगर अदालत ही कहती है किसी को भी हथकड़ी लगाओ तो कुछ नहीं कह सकते वैसे संविधान ने इसमें और सुप्रीम कोर्ट ने इसमें रोक लगा दी है और उसके बाद यदि कोई आप को गिरफ्तार करता है तो आप बढ़िया आराम से जाएं 24 घंटे के अंदर आप को कोर्ट में पेश किया जाएगा ऐसा संविधान के कानूनों में नागरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज है
आपको अपनी मर्जी के अनुसार आप अपने वकील से और मिल सकते हैं पूछ सकते हैं उसको बारे में बता सकते हैं क्या मामला है कैसे क्या बात है आप स्वतंत्र हैं भारतीय संविधान भारतीय दंड संहिता भारतीय कानून में इसकी सारी धाराओं के साथ जिक्र किया गया है मतलब कि यह कानून है क्या आप अपने वकील से मिल सकते हैं बात कर सकते पूछ सकते हैं

हां और महिला गिरफ्तारी में
महिला गिरफ्तारी में यदि किसी महिला के खिलाफ वारंट है तो केवल और केवल महिला पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर सकती है पुरुष पुलिस उसको गिरफ्तार नहीं करेगा और महिलाओं के लिए विशेष अधिकारी यह भी है कि वह सूरज डूबने के बाद और सूरज उदय होने से पहले उन्हें कोई भी गिरफ्तार नहीं कर सकता भारतीय संविधान में महिलाओं की सुरक्षा के लिए अधिकार दिए जाएं

 यदि आपको किसी भी प्रकार से और जानकारी चाहिए हैं तो आप हमें लिख सकते हैं हम आपके अपने ज्ञान के अनुरूप आपको जरूर जानकारी प्रदान करेंगे

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

व्याख्यान अवचेतन मन की शक्ति

दिनांक 7 अप्रैल 2022 समय दोपहर  1:00 बजे से
स्थान  स्वर्ण जयंती सभागृह  डां गौर  विश्वविद्यालय परिसर सागर।     
आयोजक प्लेसमेंट स्टार्टअप एंड स्किल डेवलापमेंट सेल एवं मानविकी व समाज विज्ञान संकाय 
   सभागृह मे बैढे श्रोतागण

स्वागत भाषण अंबिका दत्त शर्मा भाषण किसी पर कहानी क्यों लिखी जाए 
आपके पास और आपके संपूर्ण सोच में एक ऐसी शक्ति है जिसे हम और अवचेतन मन की शक्ति कहते हैं और सोच को समझना और उसके अनुसार काम करना या उसको अपने अनुसार काम कराना यह सब चेतन मंन ऊपर होता है चेतन और अवचेतन मन मिलकर ही आपको अपने आसपास के वातावरण को और आप जैसा सोचते हैं वैसा बनाता है यह बिल्कुल सत्य है ठीक है संसार में ऐसे कई उदाहरण हैं आप अपने आप में आप जो भी सोचते हैं आप उस काम को उसी दिन कर देते हैं लेकिन बस आप उस धारा पर चलते-चलते आप उस दिन का इंतजार करते हैं जिस दिन आप उस में सफल होते हैं सबसे पहले कोई आपके अंदर विचार आया कि मुझे यदि दिल्ली जाना है तो आप वहां पहुंच गए बशर्ते आप उसके अनुसार चले तभी पहुंच पाए नहीं तो संसार में ऐसे कई अनेकों काम आ जाते हैं व्यक्ति के पारिवारिक सांसारिक जिन वजह से वह पीछे हटते जाता है और उसका काम नहीं बनता संसार में इस प्रकार से कई उदाहरण हैं जहां में देखने को मिलते ही रहते हैं  अभचेतन मन की शक्ति को समझना और उस पर अमल कर कर चलना कोई कठिन काम नही हैऔर संयम से अपना काम करें तभी आप चेतन मन की शक्ति को समझ पाएंगे अवचेतन मन की शक्ति वह शक्ति है संसार है यह पूजा का पूरा ब्रह्मांड अवचेतन मन की शक्ति है और अवचेतन मन को समझें उस पर अमल करें उस पर कार्य करने की इच्छा करें ध्यान योग नियम संयम सबसे पहली अच्छी सोच विचार धाराओं को बदलें इससे आप अपने अवचेतन मन की शक्ति को एक संगठित रूप में शक्ति के रूप में विकास कर पाएंगे ऐसे जो सोचेंगे तो हमेशा सकारात्मक सोच करें किसी भी समय आप उल्टा ना सोचे जब आप बोलते हैं कि यार मेरा साथ तो ऐसा ही होगा मेरी किस्मत खराब है तो आपका अवचेतन मन एक्टिव हो जाता है और उसको चेतन मन के संकेत का इंतजार होता है और लगातार इसी तरह आप कहीं ना कहीं मेरे काम बिगड़ रहे हैं यह एक संकेत है आप ऐसा वातावरण बनाए जिससे आपका चेतन अवचेतन मन जो भी आपसे मुंह से निकलता है जो आपकी वाणी से निकलता है वह इस ब्रह्मांड में संगठित होता जाता है और आपके लिए वह दुगनी ताकत के साथ पुनः वापस आता है इसलिए इस बात को समझें और हमेशा अपने बारे में अच्छा सोचे तभी आप कुछ एक नया और एक अच्छा कर पाएंगे क्योंकि आपका चेतन मन केवल और केवल 5% काम ही करता है और अवचेतन मन 95% काम करता है इसलिए इस बात को बिल्कुल भी अपने दिमाग से हटा दें दिल दिमाग सोचने की भी प्रक्रिया चेतन और अवचेतन मन है कभी-कभी हम कहते हैं कि यार दिल तो कह रहा है कि ऐसा कर लो लेकिन दिमाग काम नहीं कर रहा जो दिल है वही अवचेतन मन है इसलिए इस बात को समझें सकारात्मक ऊर्जा के साथ अपने हमेशा निर्णय लें सफलता आपके साथ होगी हमेशा अच्छा सोचें अच्छा विचार करें कभी अपने बारे में बुरा ना कहीं कम से कम अपने आप से तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि ऊर्जा ना तो कभी नष्ट की जा सकती है और ना ही कभी उत्पन्न की जा सकती है केवल और केवल इसका रूप रूपांतरण ही होता है





धन्यवाद दोस्तों 
मैं पुष्पेंद्र सिंह

गुरुवार, 3 मार्च 2022

शिक्षकों को नई शिक्षा नीति 2020 के तहत संपूर्ण रूप से योग और प्रशिक्षित बनाया जाए। बुनियादी शिक्षा पर ध्यान देना है। शिक्षा -शिक्षक नीति में बदलाव करके हम नई शिक्षा नीति बदल सकते हैं

 दिनांक 3 मार्च सन 2022 दिन गुरुवार समय सुबह 

 11:00 बजे से शाम 6:10 तक नई शिक्षा नीति पर एक खुली मंच संगोष्ठी आयोजित की गई। सागर विश्वविद्यालय इसका सहयोगी रहा वहीं दिल्ली से इसका आयोजक और प्रमुख एनसीटीई रहा(राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद)  रहा 
 सागर  डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के कुलपति  डॉक्टर नीलिमा गुप्ता, अध्यक्षता करते हुए सागर विश्वविद्यालय की लर्निंग टीचिंग फांर सोशल साइंस के संतोष शर्मा उद्घोषक ,के रूप में मंच संभाला और उनके सहयोगी टीम द्वारा वही सागर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार माननीय श्री संतोष सहोरा,सागर विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के प्रोफेसर पत्रकारिता विभाग से डॉ विवेक जायसवाल, सागर विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे ग्रेजुएट ,पोस्ट ग्रेजुएट, पीएचडी स्कॉलर, डाइट के अध्यापक ने सागर जिले और सागर संभाग के प्राइवेट व सरकारी स्कूलों को के शिक्षक व शिक्षिकाओं ने सागर शहर की और गणमान्य व्यक्तियों ने इस खुली मंच संगोष्ठी ,में हिस्सा लिया प्रत्यक्ष रूप से

वही ऑनलाइन माध्यम से (दूरभाषीपटल )द्वारा जुड़ने वाले हमारे वक्ताओं ने भी इस कार्यक्रम में अपनी सफलता पूर्वक योगदान दिया ,जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रोफेसर डॉक्टर अश्विनी कुमार वर्मा ,मौलाना आजाद जोधपुर विश्वविद्यालय
प्रोफेसर डॉ नवनीत कुमार हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, से वही प्रोफेसर डॉक्टर केआर नागराजू अमरकंटक अनुसूचित जनजाति विश्वविद्यालय से,
प्रोफेसर डॉक्टर सरिका शर्मा हरियाणा से,
एनसीटीई के अध्यक्ष और उनकी सहयोगी टीम ने  30 से ज्यादा वक्ताओं ने हमारे साथ कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए इस कार्यक्रम में अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया ,इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य से शिक्षकों को नई शिक्षा नीति 2020 के तहत संपूर्ण रूप से योग और प्रशिक्षित बनाया जाए इस पर मुख्य रूप से खुले मंच द्वारा सुझाव और वक्ताओं के अपने स्तर के उनके अनुभवों को बताया  गया।

ऐसा नहीं है कि देश में से पहले शिक्षा के सुधारों में इस प्रकार के कार्यक्रम नहीं किए गए।  लेकिन यह कार्यक्रम अपने आप में एक अलग ही रूप से प्रकट किया गया। जिसमें 1 शिक्षक और शिक्षा के सारे आयामों को किस प्रकार से नई शिक्षा नीति में प्रयोग करके हम अपने देश को एक समृद्ध शिक्षा नीति का जो प्रारूप हमारा बनाया गया है। उसे कैसे उतारे और कैसे सुधार करके हमें अपने देश के राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत जोड़ पाते हैं।

नई शिक्षा नीति में सभी वक्ताओं ने अपने अपने सुझाव सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव और पक्षियों को देखते हुए रखें

हम सभी जानते हैं कि शिक्षा के तीन सोपान कला मंच और मैदान।
बस इसी प्रारूप को संक्षिप्त और सारिकव रूप से समझाने की कोशिश इस संपूर्ण आयोजक में आयोजन कार्यक्रम में की गई जिसमें बताया गया कि एक शिक्षक अपने आप में किस प्रकार से राष्ट्र हित के लिए अच्छे से अच्छा विद्यार्थी तैयार करता है।
वही इस पर हमारे समाज में शिक्षकों की क्या महत्व पर शिक्षक ही एक होनहार प्रतिभावान छात्रों को उसके अंदर की संपूर्ण कलाओं को निखारने के लिए प्रोत्साहित करता है।   
जिस सेवा या कार में अपने संपूर्ण जीवन में चाहे वह कोई भी किसी भी प्रकार का काम हो मंचो मजबूत और सकारात्मक ऊर्जा के साथ अपना हर काम करते हैं
नई शिक्षा नीति में मुख्य रूप से शिक्षा के अंदर जो एक प्रारूप बना है कि हिंदी भाषी के विद्यार्थी या ग्रामीण के शासकीय स्कूलों के विद्यार्थियों की 5 वर्ष की आयु तक आंगनबाड़ी में शिक्षा ग्रहण करते हैं। वही शहरों में अंग्रेजी मीडियम ,के विद्यार्थी किस प्रकार से 3 वर्ष की आयु में, ही नर्सरी ,यूकेजी ,एलकेजी ,में प्रवेश ले लेते हैं। और लगभग हिंदी मीडियम के शासकीय विद्यार्थियों से 3 वर्ष की ज्यादा मेहनत करके कक्षा पहली में प्रवेश लेते हैं वहीं सीधे आंगनबाड़ी से निकलकर 5 वर्ष की आयु में बच्चे को कक्षा पहली में प्रवेश दे दिया जाता है। यह एक देखा जाए तो बहुत ही छोटा अंतर है लेकिन यह समझने वाले हमारे विद्वानों ने जो कि इस प्रारूप में प्रथम रूप से बताया है यह बहुत अच्छा निचोड़ निकाला है क्योंकि जब तक आप का आधारभूत स्तंभ ही मजबूत नहीं होगा। तो उच्च शिक्षा के लिए आप किस प्रकार से बढ़ सकते हैं शिक्षा नीति में सबसे अहम प्रारूप है क्योंकि हमारी शिक्षा प्रारंभिक शिक्षा ही जीवन का सबसे अहम आधार होता है जहां से व्यक्ति एक अच्छी शिक्षा प्राप्त कर के उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ता है।  क्योंकि अगर आप का आधारभूत स्तर में मजबूत नहीं होता उच्च शिक्षा के लिए आप कैसे बढ़ पाएंगे। प्राथमिक शिक्षा और शिक्षा के बीच का जो एक बहुत बड़ा अंतर है प्राथमिक शिक्षकों को माध्यमिक शिक्षकों से माध्यमिक शिक्षकों को उच्च शिक्षा से उच्च शिक्षा को उच्चतर शिक्षा से और विश्वविद्यालयों से कैसे जुड़ा जाए एक कड़ी बनाई जाए इस शिक्षा नीति के प्रारूप में जो कि 50 पेजों में तैयार किया गया।   है इसमें अहम रूप से बताया गया है या बहुत ही सराहनीय कार्य है नई शिक्षा नीति के सभी प्रबंधक कमेटियों का

जैसा कि हमें ज्ञात है 1986 में शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है।   और 2020 में जो हमारी नई शिक्षा नीति आई है जिसने यह बदलाव किया गया है कि यदि कोई छात्र किस प्रकार से अब वह बहूयामी अर्थात एक चयनित विषय के साथ अपना रुचि पूर्ण विषय भी चयन कर सकता है।  जैसे कि अगर कोई विद्यार्थी गणित विषय लेता है उच्च शिक्षा के लिए और वह उसका रुचि पूर्ण विषय संगीत है तो वह इस शिक्षा नीति में सुधार किया गया है कि वह अपने पसंद का विषय यानी कि गणित के गणित के साथ काला का विषय भी ले सकता है।  और अपना अध्ययन कर सकता है जो कि  'एक बहुत बड़ा बदलाव किया गया' है अर्थात गणित के साथ व कला विषय विषय जैसे कि गायन  आदि का चयन करके भी अपने उज्जवल भविष्य के लिए और अपने पसंदीदा विषय चुनकर अपने उच्च शिक्षा कर सकता है लेकिन यह गणित नहीं।   सभी प्रकार के विषयों में जिसमें आपकी रुचि है आप अपना पसंदीदा विषय और अपना अहम विषय के साथ आधारभूत विषयों के साथ भी दूसरे विषय ले सकते हैं यह भी इसमें प्रारूप जो दिया गया है बहुत अच्छा सुधार किया गया है नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षा नीति के और भी अहम कोठारी सुधार शिक्षा नीति पर भी परिचर्चा करके सुधार किए गए है इसी आयोजन मैं 

हमारे प्रमुख वक्ताओं ने भी हमें शिक्षा नीति के प्रारूप को समझाने की कोशिश की जिसमें हमारे वक्ताओं में प्रमुख रूप से 

प्रोफेसर डॉ रश्मि जैन उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति के तहत यह ड्रॉप हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओं में उपलब्ध है।   इसमें देशभर के सुझाव का निचोड़ समाहित किया गया है नौकरी की सीमा शिक्षा के बाद नौकरी की सीमा सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में 1% से 2% नहीं प्राइवेट में 15 से 20% और मुख्य रूप से स्वरोजगार में ही हम कुछ अलग कर सकते हैं इसलिए हमें शिक्षा के लिए अपना 100 प्रतिशत देना होगा तभी हम कुछ अलग कर पाएंगे। 

प्रोफेसर डॉ अजय कुमार चौबे जी    नई शिक्षा नीति में यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है।  एनपीएसटी शिक्षकों को कैसे समझाया जाए शिक्षकों की अवधारणा जिम्मेदारी कर्तव्य और शिक्षक महत्वपूर्ण है। इस ढांचा को तैयार करने के लिए एक निष्ठावान शिक्षक विषय के और इस समाज में एजेंट के रूप में काम करता है शिक्षक को अपने हिस्से की स्वतंत्रता नहीं है वह भी मिलनी चाहिए और काम के प्रति तभी वही निष्ठावान होगा

प्रोफेसर डॉक्टर राकेश सिंह   भाषा एक क्रियाशील चीज है उन्होंने बताया कि बहुभाषिकता को भी इन्होंने बहुत अच्छे से विस्तारपूर्वक समझाया कि कैसे एक मतलब की एक मातृभाषा  का ज्ञान भी शिक्षकों के पास होना चाहिए उस क्षेत्र से संबंधित आधारभूत शिक्षा के लिए मुख्य रूप से प्रारंभिक शिक्षा हेतु तभी हम इस एनसीटीई के कार्यक्रम को सुचारु रुप से कर पाएंगे जैसे कि किसी संथाली भाषा और हिंदी भाषा के शिक्षक को दोनों भाषाएं आनी चाहिए। भाषाओं का जुड़ाव  होना चाहिए संताली भाषा के शिक्षक को हिंदी और हिंदी भाषा के शिक्षक को संताली उर्दू गुजराती पंजाबी आदि भाषाओं का ज्ञान होगा।   तभी हम भाषाओं को समझ पाएंगे और भाषाओं के मातृ भाषाओं के ज्ञान को महत्व दे पाएंगे।

डॉक्टर अश्वनी वर्मा जी मौलाना आजाद जोधपुर
उन्होंने बताया कि हमारे विश्वविद्यालय किस प्रकार से मातृभाषा उर्दू प्राथमिक शिक्षा से लेकर पीएचडी की शिक्षा भी दे रहा है।    अर्थात उर्दू में प्रदान कराता है उन्होंने आजादी के पहले की नीति आजादी के बाद की शिक्षा नीति और इस नई शिक्षा नीति में बहुत अच्छे तरीके से समझाया और बताया उन्होंने कुछ आंकड़े भी दिए जिसमें देश में 5 करोड बच्चे ऐसे हैं जो कि लिखने पढ़ने में भी बहुत कमजोर हैं एनपीए ने ईमानदारी से माना है कि।
विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा का अभियान अवश्य ही होना चाहिए।

समाज शिक्षक को विशेषता देती है आदर सम्मान देती है
शिक्षक  की ट्रेनिंग का मुद्दा है।   अध्यापक की सुविधाओं का मुद्दा है 1986 की नीति शिक्षा नीति न्यूनतम स्तर तय करना चाहिए समान शिक्षा प्रणाली की नीति है शिक्षकों का काम निश्चित हो काम अच्छा होगा अच्छा काम करने पर शिक्षकों को प्रोत्साहित किया जाए आप इसका पुरस्कार दिया जाए मनोवैज्ञानिक तौर पर शिक्षकों को मजबूत किया जाए ताकि नीति से जोड़ा जाए उन्होंने बताया कि किस प्रकार से दक्षिण के महानगरों में आईआईटी, और आई आई एम, कोचिंग परीक्षाओं के विद्यार्थियों को दसवीं के बाद ही स्कूल नहीं होते सीधे कोचिंग संस्थानों में प्रवेश ले अपना मुकाम हासिल करते हैं इस प्रकार की शिक्षा में बदलाव किया जाता है 12वीं की कक्षा यानि कोचिंग संस्थानों से करवा दी जाती है

प्रोफेसर डॉक्टर मनीष वर्मा  बुनियादी शिक्षा पर ध्यान देना है शिक्षा शिक्षक नीति में बदलाव करके हम नई शिक्षा नीति बदल सकते हैं इन्होंने एक अहम रूप से शिक्षक बनने के प्रशिक्षित प्रशिक्षण ओं को बताएं कि किस प्रकार से D.Ed, B.Ed, में बदलाव किए जाएं और जो प्राइवेट और सरकारी संस्थाओं द्वारा डीएड और बीएड की ट्रेनिंग दी जा रही है इसमें किस प्रकार से बदलाव किया जाए पुरानी दिया B.Ed की जो ट्रेनिंग प्रशिक्षण दिया जाता था वह बहुत सख्त होता था, आजकल तो सरकारी और प्राइवेट संस्थानों ने डीएड और बीएड यानी कि शिक्षकों की शिक्षा पूर्ण प्रशिक्षण को ही बदल दिया है उससे संयुक्त रूप से सशक्त रूप से पालन करना होगा तभी हम अच्छे आदर्शवाद और ज्ञानबाग शिक्षकों को ही समाज को दे पाएंगे शिक्षक कौशल की आवश्यकता पड़ती है शिक्षक स्वयं को वैश्वीकरण के युग में विकास और प्रतिस्पर्धा का यह योग वैश्वीकरण नाम दिया गया है कि हमारी अचार परंपरा गुरुकुल परंपरा हमारी आदि अनादि परंपराओं को बदल चुकी है हम सामाजिक चुनौतियों में अब अपने आप को बदलना है तभी हम वर्तमान में आदर्श शिक्षक दे पाएंगे जो शिक्षक दायित्व अपना सकें चिंतनशील हो विवेकपूर्ण हो धैर्यवान हो उन्हीं को ही शिक्षक के रूप में कार्य करना चाहिए

एनसीटीई के अध्यक्ष
सागर विश्वविद्यालय और सागर विश्वविद्यालय की कुलपति आयोजक टीम और रजिस्ट्रर संजय सर जी सभी की प्रशंसा करते हुए उन्हें उन्होंने बताया कि एनसीपी की नई एप्लीकेशन गुणवत्ता को और बढ़ा रही है भारतीय शिक्षा नीति की जिम्मेदारी दी गई है यह गुणवत्ता अतिरिक्त 2021 में 700 केंद्र खुल चुकी है और 2000 से 3000 सुझाव के बाद
करीब 200 शिक्षकों ने हमारे खुद की संस्था के जनता के बीच में जाकर पहला ड्राफ्ट तैयार किया है

हमने स्पेशल 15 लोगों की कमेटी बनाई है जिसमें 10 विश्वविद्यालयों का दौरा किया गया है एन. ए. पी.  को लागू कराने के लिए 1 साल यानी कि मार्च 2021 से 31 मार्च 2022 तक इसे पूर्ण किया जाएगा 
 
सर्वप्रथम इसमें 5000 शिक्षकों को प्रशिक्षण के लिए बुलाया जाएगा रूपरेखा तैयार करके उन शिक्षकों को दिसंबर तक ट्रेनिंग दी जाएगी 2022 में और उसके बाद इस प्रारूप या प्रैक्टिकल को किस प्रकार से कैसा क्या रहा इसका रिजल्ट देखा जाएगा इन्हीं शिक्षकों के द्वारा

इस प्रोजेक्ट में सागर विश्वविद्यालय का यह में योगदान रहा एनसीपी के अध्यक्ष ने बताया कि लगातार विश्वविद्यालय हमारा सहयोग करता आ रहा है कोरोनावायरस समय में भी विश्वविद्यालय ने हमारा बहुत अच्छे से समस्त प्रारूपों को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से कार्यक्रम आयोजन किए गए जंतुओं से सवाल-जवाब सुझाव की प्रतिक्रियाएं भी हमारे लिए समर्पित की गई

यह त्रि स्तरीय कार्यक्रम में स्मृति चिन्हों को भी विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों को प्रदान किए गए
जिसमें संतोष सहोरा,  आशुतोष गोस्वामी ,प्राची जैन ,आलोक सर जी, रितु यादव, जी प्रवीण गौतम जी ,और विवेक जायसवाल जी ,को यह स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए,

 समापन वेला में रजिस्टार संतोष  सहोरा ने अपना 
कार्यक्रम को समाप्त करते हुए डॉक्टर संतोष सहोरा जी ने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हमारे समस्त वक्ताओं पीएचडी स्कॉलर ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थी शिक्षक गणों समस्त जोकि इस में सम्मिलित हुए भाग लिए सभी का आभार व्यक्त किया इस संपूर्ण प्रोग्राम में जो कि सुबह 11:00 बजे से 6:00 बजे तक था त्रिस्तरीय कार्यक्रम में दोपहर भोजन की व्यवस्था भी विश्वविद्यालय की ओर से की गई थी

निष्कर्ष    
इस समारोह में सम्मिलित होकर हमने यह सीखा है कि किस प्रकार से शिक्षा को बहुआयामी बनाया जा रहा है शिक्षा को वास्तविक रूप में मानव के संपूर्ण विकास के लिए तैयार किया जा रहा है कैसे कोई यदि पारिवारिक परेशानियां या अन्य किसी परेशानियों से शिक्षा को छोड़ देता है और यदि वह चाहे1 साल 2 साल अधिकतम 5 साल बाद यदि वह  प्रथम वर्ष की परीक्षा दे चुका था तो द्वितीय वर्ष में सीधे तौर पर प्रवेश ले सकता है शिक्षा और शिक्षा के सुधार वाले इन विद्वानों ने इसमें बहुत आहम रूप से अपना ध्यान दिया है और शिक्षा को बहुत ही अलग प्रकार से शिक्षित होने के लिए प्रकट किया गया है वैसे भी हम सभी जानते हैं शिक्षा समाज की मनुष्य के अंदर विद्यमान आलोक एक ऊर्जावान और एक अच्छे जीवन जीने की सीख देती है
 बहुत जल्द ही इस प्रारूप को हमारे समाज में उतार दिया जाएगा करीब दिसंबर से इस नई शिक्षा नीति के तहत अध्यापकों को तैयार करके समाज में सीखने के लिए हमारे बच्चों को जो एक नई ऊर्जा के साथ नई शिक्षा नीति 2020आई है हम उसका दिल खोलकर स्वागत करते हैं

धन्यवाद मेरे दोस्तों।

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